Sunday, May 3, 2020

मंथन

मंथन

घटनाएं कभी-कभी जिंदगी का रुख बदल देती है। हम सभी के जीवन में कोई ऐसी बात घट जाती है जो पूरे जीवन की दिशा को बदल देती है। सोचिए ना कुछ पुराने किस्से, कुछ यादें सब हमको यह रूबरू कराती है, कि हम पहले तो ऐसे जीते थे पर इस घटना के बाद हमारा नजरिया ही बदल गया। जैसे कोई एक घटनावश किसी व्यक्ति ने पूरा पहाड़ ही खोद दिया। कोई अपने परिवार में आई हुई समस्या से एक ऐसी वस्तु का निर्माण कर दिया जो सबके लिए उपकारी हो गया। समाज में एक घटना से पूरे सामाजिक स्तर पर बदलाव शुरू हो गया। इस तरह हर घटना हमको विचार करने के लिए अवसर प्रदान करती है की कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही हमसे? या हम इससे बेहतर जी नहीं सकते क्या? कहीं कुछ बहुत जरूरी और अहम बात छूट तो नहीं गई?
घटनाएं हर स्तर पर घटती रहती है कुछ व्यक्तिगत होती है तो कुछ पारिवारिक घटनाएं, कुछ सामाजिक तो कुछ प्राकृतिक। इन सभी का प्रभाव भी हर स्तर पर दिखाई पड़ता है।
ऐसी ही एक घटना आज संपूर्ण मानव जाति के सामने आई है "कोरोना"। एक विषाणु, जिसे हम देख भी नहीं सकते। यह विषाणु से जो समस्याएं पैदा हो रही है वह घटना के रूप में देखें, तो हमारा ध्यानाकर्षण ही करा रही है कि हम कोई गलती तो नहीं कर रहे, हम इससे बेहतर जी सकते हैं क्या? क्या इस भाग दौड़ में कोई जरूरी और अहम बात छूट तो नहीं रही?
आइए देखते हैं क्या हो रहा हैं आखिर।

प्रकृति:-

इन दिनों जिस तरह प्रकृति में बदलाव आ रहा है, उस से समझ में आता है कि प्रकृति में खुद को ठीक करने की एक अद्भुत व्यवस्था है। जैसे ही मानवजाती का हस्तक्षेप कम हुआ, प्रकृति अपने आप ही संतुलित हो रही है। उदाहरण के रूप में नदियों का पानी साफ हो रहा है, हवा की गुणवत्ता सुधार रही है, यहां तक कि ओजोन की परत में जो छेद हो रखा है वह भी भर रहा है। इतने बढ़िया परिणाम, वह भी हमारे कुछ किए बिना। क्या हमसे प्रकृति को समझने में कहीं चूक तो नहीं हो गई? सोचो यदि ऐसे ही प्रकृति साफ बनी रहे बिना कोई प्रदूषण के तो! जो वातावरण हमारे लिए पोषक भी हो एवम् पूरक भी हो तो। क्या इसके लिए हमको कोई कदम नहीं उठाने चाहिए या नहीं? क्या प्रकृति के नियमो को समझ कर ऐसा जिया जा सकता है जिस से हम भी बने रहे, प्रकृति भी बनी रहे हमेशा हमेशा के लिए? आने वाली सभी पेढ़ियो को उत्तरोत्तर बेहतर से बेहतर हवा, पानी मिले यह संभव हो सकता है क्या? प्रकृति में जो तापमान है या जो दबाव है, ऋतुएं है एवम् खनिज है, क्या हम उसे संतुलित बने रहने में कोई सहयोग कर सकते है? क्या प्रकृति को संतुलित बने रहने के लिए मानवजाती सहयोग करना चाहिए? यह सब सवाल है मानव जाति के लिए। यदि इन सभी सवालों का उत्तर यह आता है हां, हमे समझना है कि कैसे हम मिट्टी, धातु, खनिज, वनस्पति, जीव जानवर सभी प्रकृति कि अवस्था के साथ पूरकता के साथ जी पाए। तो उसके साथ जीने के को नियम है उसे समझना पड़ेगा। जैसे जैसे समझ में आएगा, हम वैसे वैसे अपनी पूरकता निभाते जाएंगे और अक्षुण्ण रूप से हम साथ साथ जी पाएंगे।

समाज :-

इन दिनों कोरोना महामारी के कारण "सामाजिक दूरी" शब्द को हम पहली बार महसूस कर रहे है। मूल में आशय तो भौतिक दूरी का ही है, एक दूसरे के पास आने में एक निश्चित अंतर बना कर रखना। इन सब के साथ ही सभी अपने परिवार में ही रहने के लिए बाध्य हो गए। हमारे गली, मोहल्ले, बाजार, मिलना जुलना, त्योहार सभी थम गए। हालाकि इंटरनेट के आविष्कार से हम एक दूसरे को देख लेते है, बातचीत कर लेते है। पर फिर भी जब पता चलता है कि हमारा कोई अपना परेशानियों से घिरा है लगता है दौड़ के उसके पास पहोंचा जाए। पर इन दिनों की परिस्थिति के कारण हम मिल भी नहीं सकते। यहां तक आखरी समय में अपने स्वजन कि मृत्यु पर भी नहीं जा पा रहे। क्या यह सब हमको यह ध्यान नहीं दिला रहा को हमको सामाजिकता की कितनी जरूरत है? क्या हम बिना संबंधों के निर्वाह किए जी पाएंगे? मान लो हमको जो भी वस्तुएं चाहिए वह सब एक जगह उपलब्ध करा दिए जाए, फिर भी किसी अपने के लिए कुछ करने का, उनको सहयोग करने का या उनके साथ ममता, स्नेह, सम्मान आदि मूल्यों का निर्वाह किए बिना हम तृप्त हो पाएंगे? क्या इसकी कमी खलती है? क्या अपनों के साथ जीना अपनी कोई भी भौतिक आवश्यकता से ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है? क्या हमे इन संबंधों में कैसे तृप्ति पूर्वक जीना यह समझना आवश्यक लगता है? क्या हम संबंधों को समझ कर उसे अच्छे से निर्वाह करना चाहते है?

परिवार :-

सामाजिक दूरी के बाद आता है परिवार। आज हम सब लोग जिन भी लोगो के साथ घर में है वह है परिवार। यहां तक कि जो लोग जहां फसे है, वहां से अपने परिवार तक ही पाहोंचना चाहते है। यहां जो अपने परिवार के साथ है, वह परिवार में ही अपना समय कुछ करते हुए बिता रहे है। परिवार में जो सदस्य है उनके साथ भी निर्वाह होना है, व्यहवार होना है और उसको समझना भी जरूरी है यह ध्यान जा रहा है। परिवार को छोड़कर बाहर जी लेंगे यह हो नहीं पाएगा यह भी समझ आ रहा है कि नहीं? यदि परिवार में जीना है तो उसे समझना, उसमे अपने जिम्मेदारी को समझना यह भी एक जरूरत है कि नहीं? उसके साथ परिवार कि मानसिक एवम् भौतिक जरूरतों को पूरी करना यह भी जरूरी है कि नहीं? यह सब इस समय ध्यान जाता है कि नहीं?

मानव :-

इस समय स्वास्थ्य संबंधी जो विपदा आ पड़ी है उसमे हमको यह सोचने का भी अवसर मिला है कि आखिर कार में क्या हूं? मै क्या चाहता हूं? मै खुश रहना चाहता हूं तो उसमे मैंने अभी तक जो प्रयास किए उसमे कहा तक पहुंचा? जो भी चीजे मुझे चाहिए थी वह अब ना मिलने पर भी क्या में खुश हूं? क्या मै कुछ भी नहीं करता हूं और अपने कर्तव्यों से भागता हूं तो क्या उस से खुश हूं? आखिर क्या है जो छूट रहा है? क्या मै जो चाहता हूं उसे में समझकर पा सकता हूं? क्या सभी जो चाहते है वह पा सकते है? क्या हम सभी एक जैसा ही चाह रहे है? इन सब प्रश्नों से मुझे समझना है यह निश्चय बन रहा है क्या?

व्यवस्था :-

आज इस घटना से एक ध्यान तो गया की हमारी मूलभूत जरुरते क्या है? जैसे हमे शुद्घ हवा, पानी, अन्न, औषधि ये सब चाहिए जो हमारे शरीर को स्वस्थ्य बनाए रखे। क्या हमे रोटी, कपड़ा, मकान के लिए आवश्यक वस्तुएं सरलता से मिल पाए ऐसी व्यवस्थाएं है क्या? जैसे आज की स्थिति में हमको सब्जी, फल, दूध, तेल ये सब चीजें आसानी से उपलब्ध है क्या? क्या इन चीजों को हम तक पहोंचाने में कोई परेशानी हो रही है? यदि यह सारी चीजे हमारे आस पास नजदीक में ही उपलब्ध हो जाए तो कैसा रहेगा? यदि हम सब इन उत्पादनों में कोई सहयोग कर पाते तो कैसा होता? क्या हमारा परिवार इन चीजों में से कुछ उत्पादन कर पाए तो कैसा होगा?
आज बहुत सारी वस्तुओं के बिना हम जी रहे है। नाही कोई रेस्टोरेंट खुला है, नाही कोई सिनेमा हॉल। हम घर में ही नए नए पकवान बने रहे है, नए सिरे से नए काम सीख रहे है। क्या हम व्यवस्था को समझ कर हमसे को अव्यवस्था खड़ी हुई है उसपे पुनर्विचार कर नहीं सकते? क्या मानवजाती, मानव को समझ कर और इस पूरे धरती पे मानव कि भूमिका को समझ कर साथ साथ उत्सवित होकर जी सकते है?

मानव जाति को सौभाग्य से इन सभी को समजने के लिए एक प्रस्ताव उपलब्ध है। श्री ए.नागराज जी द्वारा प्रस्तावित मध्यस्थ दर्शन (सह अस्तित्ववाद) इस धरती पर रहने वाले सभी मानव के समझने एवम् नित्य उत्सव पूर्वक साथ साथ जीने के लिए है। यदि इस घटना से हमे खुद को और हम से जुड़े हुए सभी पहलू को समझने की आवश्यकता लगती है तो इसे समझ ने के लिए प्रयास करते है। यही इस घटना कि सार्थकता हो सकती है।

लेखन एवम् जिम्मेदारी
जिगर
अध्येता: - मध्यस्थ दर्शन ( सह अस्तित्ववाद)
अधिक जानकारी हेतु:-
 http://madhyasth-darshan.info/


Friday, September 30, 2016

उम्मीद

आज शाम कुछ नर्म थी. एक सन्नाटा सा छाया हुआ था बादी में. आकाश भी लाल रंग से लथपथ था. मानो सूरज के टुकड़े करके बिखेर दिए हो. कभी वही लालिमा आग की लपटों में तब्दील हो जाती हो ऐसा दृश्य. ये पहली बार तो नहीं था. ऐसा पहले भी हुआ था. हां मगर आज मंजर कुछ अलग था. 

थोड़ी देर में कोयले से भी काला तिमिर छा रहा था. कुछ लकड़िया एकदूसरे के सहारे से जल रही थी. कुछ लोग अपने द्वेष को मलते हुए शिकाय कर रहे थे. 
लोहे का वह ढांचा जैसे कोई फैसला देने वाले मुकाम की तरह तन के पीछे खड़ा था. 

कुछ अलफ़ाज़ निकले " जनाब, आज तो इतिहास ही बन गया. क्या खूब मज़ा चखाया. "

दूसरी ओर से और ज्यादा जुनून से आवाज़ आई " महाराज, इसी को कहते है, " सूत समेत वापिस करना. एक के बदले दो". ठहाके के साथ अट्टहास्य फ़ैल गया. 

एक राहगीर गुजर रहा था वहां से. आग देख कुछ उम्मीद के साथ वहाँ बेठ गया. किसी ने पूछ लिया " और भाई आज तो जश्न का मौका है, तू भी शेक ले". राहगीर चुप था. धीरे से बोला " कैसा जश्न? कुछ खास तो नहीं हुआ"

कोई झटपटाते हुए बोला" कैसा बौड़म है, इतना बड़ा साहस का काम हुआ है आज और ये कहता है कुछ नहीं हुआ"

राहगीर लंबी सांस लिए बोलता है" कल मानवीयता की हत्या हुई थी, आज इंसानियत का क़त्ल हुआ है". बोलते हुए उठ खड़ा हुआ. और एक धुंधली सी दिखाई देती रोशनी की और चल पड़ा. 

Wednesday, July 27, 2016

वर्चस्व

यह शब्द "वर्चस्व ", क्या मायने है इसके ? क्या हम इसे "पहचान " माने या फिर "विशेष " दर्जा .

हर व्यक्ति या व्यक्तिओ का झुंड इसे पाने में भारी  जद्दोजहद कर रहा है. और जब किसी तरह इसे हांसिल करने में कामयाब हो जाता है तो फिर किसी भी कीमत पर इसे बनाये रखने में सारा जोर लगा देता है .

जब हम झुंड/समूह की बात करते है  तो वह दो या फिर दो से अधिक व्यक्ति हो सकते है . यह झुंड कई प्रकार के पाए जाते है . दांये वाले , बांये वाले, विनिमय वाले, बिचोलिये , सतासीन , उदासीन , सांप्रदायिक, बिन सांप्रदायिक , सरकारी , गैर सरकारी , बुद्धिजीवी , बुधुजिवी , संवेदन शील , कट्टर पंथी , समज सेवक , समाज सेवक, बाजारवादी वगैरा वगैरा ....

पर सवाल आखिर ये उठता है की वर्चस्व क्यों ? क्या जरुरत है इसकी ?

मूल में अगर समजने जाये तो बात सिर्फ इतनी निकलके आती है. एक सोच को , विचार को क्रियान्वित करने के लिए अगर एक से ज्यादा लोगो की आवश्यकता है तो उन सब को किसी एक सोच या विचार से जोड़ना पड़ेगा ही . और बार बार समय समय पर उसी सोच को श्रेष्ठ ही मनवाना पड़ेगा. इस से बाकी सारे काम आसान हो जाते है . अगर हर बार किसी  भी कार्य के लिए झुंड में से मौलिक सोच से निर्णय लेने जाये तो सब को मनाने की क्षमता अभी नहीं है लोगो में और इसमें समय भी काफी लगता है .

अगर मानव को समजने जाए तो सरे क्रिया कलाप में एक से अधिक मानव की आवश्यकता है ही . और जैसे ऊपर झिक्र किया है , हर मानव में हर बात अपनी सोच से सार्थक साबित करने की क्षमता नहीं है . इसी कारणवश "वर्चस्व" की चाह जाग उठती है . यही झुंड की भी वर्चस्व को पाने की मूल वजह है. और अहम् की पुष्टि तो इसके साथ जैसे भेट के रूप में मिलती ही रहती है .

आज की समस्या पर जरा गौर फरमाईये . क्या है आज की समस्या :

  • वैश्विक उश्माकरण - मानव का प्रकृति पे वर्चस्व 
  • धार्मिक युद्ध - एक संप्रदाय का दुसरे संप्रदाय पे वर्चस्व 
  • विश्व युद्ध - राष्ट्र का दुसरे राष्ट्रों पर वर्चस्व 
  • प्रान्त / राज्य वाद : एक प्रदेश का दुसरे प्रदेश पर वर्चस्व 
  • जाती वाद : एक जाती का दुसरे जाती पर वर्चस्व 
  • राजकारण : एक पक्ष का दुसरे पक्ष पर वर्चस्व . पक्ष  का जनता पर वर्चस्व 
  • व्यापर : व्यापारी का उपभोक्ता पर वर्चस्व 
  • लिंग वाद : एक लिंग का दुसरे लिंग पर वर्चस्व 
  • परिवार का टूटना : रिश्तो में वर्चस्व 
इन सब समस्या की जड़ में जाये तो आखिर कार सब वर्चस्व स्थापित करने के लिए है और उसे टिके रखने के लिए ही सारा जाल बिछाया है

तो सवाल ये है की आखिर ये हमारे आप के जीने में कैसे समस्या है ? मेरी झिंदगी में इस से क्या फर्क पड़ता है ?  फर्क पड़ता है , और बहोत गहरा फर्क पड़ता है . इंसान में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु क्या है जो उसे सृष्टि में सब जीवो से अलग करती है ???

सोचने की क्षमता .

मान लो  आप को वही सोचने पर मजबूर किया जाये जो अनजाने में आप नहीं सोचना चाहते. अगर किसी भी व्यक्ति या समूह पे आपको शाशन करना है , या अपनी मनमानी की बात मनवानी है तो उसकी सोच को तोड़ दो . जब मौलिक सोच ही नहीं रहेगी तो सोचोगे कहा से ? फिर तो वोही सोचोगे जो वोह दिखायेंगे या सुनायेंगे . जब यह भी तय हो जाये की क्या दिखाना या सुनाना है तो आप इसी में उलजकर रह जाते हो.

अगर एक बच्चे का उदहारण ले तो उसे अपने घर में अपनी जाती , धरम, खान पान , समाज सब को लेकर एक समज दी जाती है . या यु कहे थोपी जाती है . और बाकी का काम वातावरण कर देता है . चाहे वोह शिक्षा संकुल हो, बाज़ार , मनोरंजन . संचार माध्यम . सब एक पालतू नागरिक बनाने में अपना यथायोग्य योगदान देते है . ताकि यह पालतू नागरिक उस परिवार , समाज , देश, राष्ट्र या फिर वर्चस्व वादीओ के इशारे पर सोचे और चले .

बस इतना सा काम है . एक बार मानसिक रूप से गुलामी कायम हो गयी फिर जो मर्ज़ी चाहे करवा लो . दंगा फसाद , आन्दोलन, ब्लास्ट.. मतलब कोई भी अमानवीय काम करवा लो.  मानवीयता को अमानवीयता में तब्दील होने में १ सेकंड भी नहीं लगता

Mass Hypnotism करके एक शब्द आया है . इस पर सोच विचार करे तो पता  चलता है की बड़ी तादात में सोच पे काबू किया जाये तो मनचाहा काम करवा सकते है . इस में अगर कुछ मौलिक सोच वाले लोग है तो उन्हें भी इसी भीड़ में कैसे शामिल किया जाये उसी की दौड़ लगी रहती है .

सारी व्यवस्थाए भी ऐसे बनायीं जा रही है जिस से मानसिक गुलाम बनाना और भी आसान हो जाये . भारत की ३१% आबादी आज शहर में बस रही है जो आनेवाले कुछ १० वर्ष में ६० % हो जाएगी . वश्विक फलक पर भी यही चल रहा है .  क्या मिलेगा इस तरह के शहरीकरण से . जब गति इतनी ज्यादा होती है तो स्थिति का आंकलन करना कठिन होता है . रूबिक्स क्यूब पता है आपको. वोह छह रंग वाला चोरस टुकड़ा . उसे बस घुमाये जाओ उस आस में की सारे एक रंग के साथ में आयेंगे . पर आता नहीं तब तक आप का ध्यान जरुर मुद्दों पे से हट जाता है . यही काम गति का है . उल्जाये रखो . मूल मुद्दा गायब . प्राकृतिक संसाधन  गायब . वर्ग विग्रह बढ़ने दो . ऐसी व्यवस्था क्यों???

जवाब आत है "हर मानव यही चाहता है , ईसि लिए तो ये सब हो रहा है " पर असल में देखने जाये तो पता चलता है की हर मानव इतना दूरदर्शी नहीं है . दूसरा उसे इतनी फुर्सत ही नहीं है की ये सब सोचे . दोनों ही के मूल में वर्चस्व का मायाजाल है . वाही पेंतरे और तरकीबे . आदमी की सोच पे काबू और उसे व्यस्त रखो . फिर वाही व्यक्ति है , समाज , सम्प्रदाय . राज्य . राष्ट्र , या विश्व . यही पेंतरा चलता था, और चल रहा है .

कुछ जो मौलिक सोच से कुछ बदलने की चाह रखने वाले है जो इन वर्चस्ववादीओ के थपेड़ो से शांत होकर बेथ जाते है .

क्या इस से निकलने का कोई रास्ता है ? कोई उम्मीद है ? क्या कभी आदमी अपनी मौलिक सोच से जी पायेगा ? या फिर दुसरो पर वर्चस्व स्थापित करने में अपना सारा समय और उर्जा खर्च करता रहेगा ?

यक्ष प्रश्न :)







Wednesday, July 20, 2016

मज़ा

धुक... धुक... धुक.. धुक.. एक लय में चलती हुई मोटरसाइकिल और साथ में चार की मात्रा में तबले की ताल जैसा पथ्थरो का साथ. बिच में पानी का झरना जैसे खंजरी की कमी पूरी करती हुए शास्त्रीय संगीत में मंत्रमुग्ध करता था. परिचालक अपनी ह्रदय के नाद को बखूबी संगीत के तालमेल में डुबो कर आनंद ले रहा था.
एक पड़ाव पे आके रुकता है तो लगा जैसे संगीत कुछ देर छुट्टी मनाने चला गया. कह कर गया जैसे थोड़ी देर में आता हु. चाय की चुस्की लेते हुए जब सामने बेठे शक्श को देखा तो अपनी मानस पटल पे बहोत सारे चित्र पलट कर देख गया. अचानक से एक आवाज़ की रणकार गूंजी "ब्रिजेश????" सामने शक्श मुस्कुराया और बोला "निमित"! दोनों गले मिले और कहने लगे "बहोत साल हो गए " ब्रिजेश कहता है "काफी तर्रक्की कर ली तुमने तो दोस्त"
सामने से जवाब आया "नहीं. अभी भी वही हु, जहा पहले था " ब्रिजेश कुछ समज न पाया हो ऐसे आँख बड़ी कर के इशारा करने लगा. फिर जवाब आया "बचपन में साइकिल किराये पे लेते थे चंद घंटो के लिए और ज़िन्दगी के मज़े लूट ते थे. आज मोटरसाइकिल किराये पे लेकर पहाड़ो में घूम रहे है वोही ज़िन्दगी के मज़े तलाश ने में. चंद घंटे दिनों में तब्दील हो गए है. पर ज़िन्दगी अब भी समज नहीं आई. कुछ भी तो नहीं बदला. वंही तो खड़े है हम. तलाश अब भी तो ज़ारी ही है "
ब्रिजेश सुनकर सोच में पड़ गया. अब भी आखरी शब्द उसके ज़ेहन में बजते रहे "तलाश अब भी जारी है"
फिर से वोह मंत्रमुग्ध करने वाला संगीत खनक ने लगा..
धुक... धुक..... धुक.... धुक.... धुक.....

Monday, June 6, 2016

जशन



जशन 

सड़क बन ने का काम चल रहा  हो जहां , वहां  बड़ी सी पाइपे लगी होती है वोह याद है? जहाँ  बच्चे  लूका छुपी खेलते है, तो कभी उसमे  मजदुर रात बशर किया करते है. उस पाइप की तरह सुरंग सी लम्बी शेहनाई. उसकी एक छोर पर महाशय तान्येक. तान्येक कितने ही बेरिआत्रिक तबिबो की उम्मीद था. अगर आज तबिबो के  घर के ओवन, एलपीजी, चल रहे है तो उसमे तान्येक का योगंदान महत्वपूर्ण था. हलाकि तान्येक इन सब बातो का श्रेय हमेशा से मोमो वाले चाचा को दिया करता था. तान्येक का कहना था आज अगर मोमो वाले चाचा उसकी ज़िन्दगी में न आये होते तो वोह आज भी किसी प्रोटीन पाउडर के इश्तिहार का हिस्सा और किस्सा होता शायद. खैर वोह अपनी भारी भर्ख्म काया के लिए चाचा का शुक्रगुजार था. ऐसा खुश दिल था तान्येक.

शेहनाई को पुरे जोश से बजा रहा था तान्येक. लोग कितना भी ग्लोबल वार्मिंग, हवा का प्रदुषण वगैरा वगैरा बाते करते रहे . पर तान्येक तो इन सब से बेफिक्र होकर अपनी सरवाधिक क्षमता से हवा को अपने फेफड़ो में भर रहा था. और उसे जिस गति और लय से बहार फ़ेंक रहा था, एक मधुर सा संगीत गूंज उठ ता था. फेफड़ो की तस्वीर खिंची जाए उस समय तो कुछ सिगरेट की डिब्बी पे अंकित चित्र जैसे ही दशा होगी, पर जनाब आज ये अशुध हवा भी तान्येक को जिंदगी दे रही थी. इस तरफ तान्येक की शेहनाई और इस तरफ नगाड़ा. कुछ लाल और पीले रंग के वस्त्र से आच्छादित साधू और जुलुस. ये सब लोग नाचते गाते हुए जा रहे है. साथ में एक बक्शा भी है जिसे कुछ लोग उठाये हुए है. अपनी ही भाषा में गीत गाते हुए, मुस्कुराके नाचते हुए जा रहे है पहाड़ पर. वहा मोनास्ट्री के पीछे जंगल में सब इकठा हुए.

ये पुरे जुलुश को घुमंतू देख रहा है. जीस आंटी के घर में वोह रुका है उन्हें वोह पूछता है की हो क्या रहा है. तभी ताशी आते है जो आंटी के पति है. वोह आते ही संवाद शुरू करते है " तुम बहोत लकी हो" घुमंतू पूछता है क्यों ? वोह बोलते है "तुम्हे अलग अलग सभ्यता , और रिवाज देखने का शौक है ना . तुम्हारा लक अच्छा है . कल रात को ही यहाँ एक आदमी ने सुसाईड कर लिया . तुम को उसका आखरी जर्नी देखनो को मिलेगा . बहोत लकी हो तुम"   घुमंतू तय नहीं कर पा रहा था की इस बात को सुन के वोह खुश हो या किसी की मरने का गम मनाये. इस से पहले कुछ सोचा समजा जाये ताशी फिर से आंटी को बताना शुरू किया . "पता है उसका बीवी उसको छोड़ के चला गया. इसी लिए वोह उदास रहता था . फिर सब ठीक हो गया था " आंटी ने पूछा "उसकी बीवी वापस आ गयी थी ?" ताशी बोला "अरे नहीं. वोह उसके भाई के साथ भाग गयी फिर . फिर वोह ठीक हो गया था . उसके बाद में उसके भाई से उसने शादी कर ली" आंटी बोली "फिर क्या हुआ" तशी बोला "फिर क्या? फिर ये सब देख के वोह लकड़ी काटने जा रहा था और अचानक सुसाईड कर लिया. हमको लगता है वोह अन्दर से इस बात से खुश नहीं था " घुमंतू सोच में था अभी भी की कैसे ताशी अपने आप से ही सारी कड़ीयो को जोड़कर किसी बड़े न्यूज़ चैनल के  एक अव्वल दर्ज्जे के पत्रकार की भूमिका निभा रहा है. उसी बिच ताशी चिल्लाया "अरे भैया चलो जल्दी, आप को भी देखना है ना , चलो जल्दी से " घुमन्तु निकल पड़ा ताशी के साथ.

पहाड़ी चढ़कर मोनास्ट्री के पीछे जाना था . बिच में स्कूल आ रहा था . अब सुबह का प्रेयर का वक़्त था . प्रेयर के बाद "जन गन मन " शुरू हुआ. यहाँ पुरे हर्षौल्लास के साथ जुलुस जा रहा है . अचानक किसी महापुरुष ने सब को इशारा किया और सभी सच्चे राष्ट्रभक्त की तरह स्तब्ध होकर , पूरी तरह डेमोक्रेसी का पालन करते हुए खड़े हो गए. घुमंतू मन में सोच रहा था क्या इस बक्शे के अन्दर जो है क्या इसे भी सावधान में खड़ा करेंगे. फिर खुद ही सोचा अरे ये तो बिचारा खुद ही विश्राम में है इसे सावधान नहीं करेंगे तो भी देशद्रोही नहीं बनेगा. जैसे ही जन गन मन समाप्त हुआ, तान्येक ने फिर से राग जशन छेड़ दिया. जुलुश चल पड़ा. मोनास्ट्री के पीछे सब इकठा होकर लकड़ी लाने में व्यस्त हो गए. फिर लाल पीले वस्त्र वाले साधू कुछ मंतर बोलने लगे और कोल्ड्रिंक्स की बोतल के सामने कुछ विधि करने लगे . वहा मरने वाली की जो बीवी थी , या फिर जो अब उसके भाई की बीवी थी वोह फुट फुट कर रो रही थी . ताशी उसे देख कर बोल रहा था "कितना दुखी है यह , बहोत प्यार करती थी इस से. वोह तो उसके भाई ने इसे भगा दिया. नहीं तो इन दोनों की जोड़ी बहोत अच्छी थी " ताशी के बारे में पत्रकार की धारणा अब दृढ ही होती जा रही थी .

पीछे एक सज्जन बेठे हुए थे . बीडी के कश लगा रहे थे . चेहरे पे जुर्रिया , तेज़ आँखे , शांत मुख मुद्रा , उकडू बेठे हुए, काले कोट में न्याय के प्रतिक रूप मानो . घुमंतू एक आकर्षण से उनके पास चला गया . कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई. दोनों बक्शे को जलते देखते रहे . घुमंतू फिर बोला "अजीब है ना , मरने के बाद भी लोग त्यौहार की तरह मनाते है ". बुज़ुर्ग गंगोत्री में से निकली हुए  गंगा की धारा सी कल कल आवाज़ में बोले "ज़िन्दगी में सिर्फ तीन ही त्यौहार है " घुमंतू बस उनके सामने देखता रहा . दूसरा कश लेते हुए वोह बोले "जब हम सांस लेते है, जब हम सांस छोड़ते है और सांस लेने और छोड़ने के बिच का समय. ये तीन जशन मना पाए तो ज़िन्दगी गुलज़ार है  नहीं तो फिर बीमार है " कुछ देर तलक यूँही बीडी के कश चलते रहे . घुमंतू सोच में पड़ गया . शब्द कम थे पर बात इतनी गहरी थी की जैसे सारे अध्यात्मिक दर्शन का फलसफा मिल गया हो.

घुमंतू सीढ़ी उतर रहा है , वही तान्येक अपनी शेहनाई बजा रहा है . तान्येक के  चेहरे का दबाव साफ़ झलक रहा था. और घुमंतू का जशन शुरू हो चूका था .

Friday, May 13, 2016

सफ़र

जिंदगी confirm न हुई तो क्या हुआ, RAC ही सही,
थोडा तुम सिकुड़ लो, थोडा हम सिकुड़ ले,
एक उम्र की ही तो बात है, युंही बशर हो जानी है

Sunday, April 10, 2016

चड्डी पहन के फूल (कमल) खिला है

(इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है , इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से या घटना से कोई संबंध नहीं है)


ये कहानि है एक अव्वल दरजे के  घुमक्कड़ की.

उसका जन्म भारत के एक गाँव में हुआ था. बचपन से ही ट्रेन को ताकता रहता था और सोचता था कंहा जाती होगी, ये जो लोग आ रहे है कंहा से आते होंगे. पिताजी की चाय की टपरी थी जिस से आसानी से प्रवेश मिल जाता था स्टेशन पे.

जब वोह गाँव में खेला करता था तो भी बहार जाने की ख्वाहिस लोगो को बताया करता था . एक दिन उसकी नजर एक टोली पर पड़ी. सब चड्डी पहने हुए थे और मस्ती से खेल रहे थे . उस बाल का भी मन हुआ और वोह भी खेल ने लग गया. वहा खेल के बाद बड़े मज़ेदार किस्से कहानिया सुनाते थे. बालक और भी प्रसन्न हुआ. एक दिन उसे पता चला की इस टोली में शामिल होने से खूब घुमने को मिलेगा. उसने फ़ौरन मन बना लिया टोली में शामिल होने का. बस चड्डी पहनी और निकल पड़ा. धीरे धीरे उसने देखा अगर उसे आगे बढ़ना है तो किस्से कहानी लोगो को सुनाने पड़ेंगे तब जाकर उसे घुमने का अवसर मिलेगा. बस उसको तो वही चाहिए था. धीरे धीरे कहानीकार भी बन गया. बड़ी मनभावक कहानी सुनाता था. उसका काम चल पड़ा. टोली में रोज़ वर्जिश करना, नयी नयी जगह जाना, हसी मजाक , ठहाके और कहानिया . उसे तो मानो स्वर्ग मिल गया.

पर घर वालो को चिंता हो रही थी . अब लड़का बड़ा हो गया था, शादी के लायक. तो सब ने सोचा की इसकी शादी करा देते है तो घर पे वापस आ जायेगा और यंही रहेगा . उन्हें क्या पता उस घुमक्कड़ के खुराफाती दिमाग में क्या चल रहा है . फिर भी शादी हुई. घुमक्कड़ का मन नही  लग रहा था . वोह चला गया किसी को घर पे बिना बताये. पहाड़ उसे बहोत अच्छे लगते थे . कुछ साल वंही गुजरे . फिर वंही कुछ काम मिल गया कहानी और कथा कहनेका . वोह भी किया. आखिर में टोली का जो मुख्या था उस के पास पहोंच गया . वहां से पुरे देश घुमने की योजना बनायीं और निकल पड़ा घुमने .

पर अब देश से बात बनी नहीं. उसे तो दुनिया भर घूमना था. उसको पता चला की टोली में तो सिर्फ देश ही घूम सकते है . पर इस टोली के ही कुछ दोस्त लोग थे जो दूसरी टोली में काम करते थे. दूसरी टोली का मुख्य काम था सब को कमल के हार पहनाना और अपनी टोली में शामिल कर लेना . बस उसके साथ साथ किस्से कहानी सुनाना, देश विदेश घूमना . बस यही तो चाहिए था घुमक्कड़ को. वोह फट से इस टोली में शामिल हो गया. और उसने पाया की विदेश जाने में खूब तैयारी करनी पड़ती है और मेहनत भी. बचपन से मेहनती तो था ही . लग गया परिश्रम करने . उसे लगा की अब घर जाकर ही काम करना चाहिए. वह उसे अच्छा अनुभव था कहानी सुनाके लोगो को मंत्रमुग्ध करने का . अपने राज्य में जाकर वह मुखिया बन गया . अब देखा की यहाँ कुछ साल बितान है तो क्या किया जाये . उसे गाँव का बचपन याद आया. वह हमेशा एक तरकीब किया करता था . जब भी उसे खेल में सब का मुखिया बन ना होता था तो वोह दो दल के लोगो में कुश्ती करवाया करता था. और जो सब से बड़ी संख्या में दल होता था उसे बहोत मदद भी करता था जीतने में . बस फिर क्या . बड़ी संख्या उसे मुख्या बनाये रखती . यही तरकीब उसने राज्य में भी अपनाई और अरसे तक मुख्या बना रहा.

उस समय काल में उसने विदेश जाने की तैयारी भी की. पर कुछ पर्ची  जो जरुरी थी वोह उसे नहीं मिली. बात  ये थी की कुश्ती की वजह से उसकी बदनामी हो गयी थी. सब को डर था ये हमारे वहा भी दंगल करवा देगा . अब अपनी छवि को सुधारना था. उसने फिर तरकीब निकाली . जब खेल का मुख्या हुआ करता था बचपन में तो सबको उसके दोस्त के बारे में बोला करता था . बहोत ही अज़ीज़ दोस्त था उसका. एकदम साफ़ सुथरा . अच्छी भाषा बोलने वाला . लोगो के लिए सड़क बनाता था , पानी पहोंचाता था , मकान बनवाता था . लोगो को बड़ा प्रिय था विकास. पर एक बात उनको नही पता थी. ये विकास बहोत ही चालाक था . वोह बहला फुसला कर लोगो से पैसे एंथ लेता था और फिर उसी में से उनके काम करता था. और एक भारी बचा हुआ हिस्सा घुमक्कड़ को देता था. घुमक्कड़ एक भी पैसा नहीं लेता था उसमे से , वोह सीधा अपनी टोली में जमा करवा देता था. दोनों टोली में . क्योंकि उसको तो विदेश जाना था .


घुमक्कड़ ने अपने वहाँ देखा की कुछ विकास के दोस्तों की भी एक टोली थी. वोह लोग व्यापर करते थे . उन्होंने घुमक्कड़ से दरख्वास्त रखी की आप भी विकास के दोस्त है हम भी. चलो कुछ साथ मिलके काम किया जाय. बस फिर वोह शुरू हो गया. विकास के नाम पे अब व्यापारियों को खूब मदद करने लगा और वादा भी लिया की समय आने पर उसे वापिस वोह लोग मदद करे. विकास के तो और भी दोस्त थे विदेश में .अब उसने ये भी सोचा विदेश में उसकी जान पहचान तो होनी चाहिए . बस सारे विकास के दोस्तों को बुलाता रहा अपने राज्य में . उनसे खूब दोस्ती बढाई. अब बारी थी देश का मुख्या बन ने की . उसने अपनी ही टोली के लोगो में से कुस्ती कर प्रबल दावेदार बन गया . अब सामने वाले दल में कोई जोर नहीं बचा था . सब विकास से प्रभावित थे ही . उसने सब किस्से कहानी से लोगो में विकास को ही अंतिम सुख बताया. लोग भाव विभोर होके विकास को देख ने के लिए तरस गए. जब की घुमक्कड़ ये बताता रहा की विकास चारो तरफ दिखेगा . बस  देश भर ने उसे विकास  के मोह में आकर मुख्या बनाया . उसमे विकास के व्यापारी मित्रो ने खूब मदद भी की,

आज वोह देश का मुख्या आखिर बन ही गया . अब तो उसे विदेश जाने की पक्की पर्ची भी मिल गयी . क्योकि विकास के दोस्त सारे देशो के मुख्या भी तो थे . अब वोह दुनिया भर की शैर करता है . अपनी कहानी, किस्से अभी भी लोगो को सुनाता है . विकास को तो अब भी किसी ने देखा नहीं है. कोई कहता है विकास है ही नहीं  दुनिया में . पर घुमक्कड़ आज भी अपनी मन की बातो से लोगो को मना लेता है की विकास है. इसी के साथ उसके जीवन में अथाग परिश्रम के बाद आज वोह अपनी सपनो की जिंदगी जी रहा है. विदेशो में घुमना , तस्वीरे खींचना , कथाकार बन जाना , व्यंजनों का स्वाद लेना, नयी नयी वेश भूषा , नए विकास के दोस्तों से परिचय . और तरकीब वही है दो दल को कुश्ती करा रहा है. जो ज्यादा संख्या में है उसको चुपके से मदद कर देता है ताकि वोह मुख्या बना रहे . और इस कोशिश में उसकी मदद चड्डी वाली टोली , कमल का हार पहनाने वाली टोली और विकास , ये सब उसके साथी है.

चड्डी पहन के फूल (कमल) खिला है , फूल  खिला है..... देश विदेश में बात चली है , चड्डी पहन के फूल खिला है....


Pinjara

Raat hone ke saath sama bhi kajal ki tarah gehra ho raha tha. Baarish ki boonde damar ki sadko pe girte hi malhar raag gunguna rahi thi. Chand gaadiya, do pahiya, cycle aur bagal me kuch chattriya chal rahi thi. Kudrat ki banaye vishram sthal ki aad me kuch log vicharo ke shailab me baarish ki tivrata kam hone ka intezar kar rahe the.
Usi me se raste pe ek gaadi sanp sidhi khelte hue aage badh rahi thi. Shihe par thirkte vipers andar baj rahe radio ke saath taal mila rahe the. Steering ko ek haath se disha nirdesh karte hue yuva apni dhun me ja raha tha. Ungliyo se battiya kam jyada karne ke saath aas paas nigahe fer kuch dhundh raha tha. Khushiyo ki window shopping pe nikle yuva ko aakhir kar manzil mil hi jati hai. Sadak kinare gaadi rok niche utarata hai. Bhag ke sidha chajje ke niche khada ho jata hai aur bina piche mude ek button dabata hai jis se gaadi me kuch dhvani aur timtimati roshani hoti hai, Jo gaadi surakhsit hone ka sanket deti hai. Paas me dukan ke baramde pe ek shakhs betha hai. Shehro ki naaliyo me bhigokar nikale hue kapde, rajtantra ki tarah ulze hue ghumrale aur sarkari vaydo samaan lambe baal, bhrashtachar jaisi badhi hui daadhi aur nyay vyavastha jaisa kamzor sharir. In sab ke bavajud fakiri ki gavahi dete hue chehre pe sufiyana muskaan. Apni gehri ankho se bahot kuch kehte aur sunte hue woh yuva ko dekh raha tha. Pahad si majbut aavaz me kuch shabd nikle uske mukh se "kuch khane ko hai kya?" Yuva tiraskar se jyada kataksh bhari nazaro se dekh haath hilate hue jaise suna hi na ho waise aage badha. Choti choti roshani ki ladiya sab ka swagat karte hue kuch alfaz ke ird gird daud rahi thi. Baar baar girgit ki tarah rand badal rahi thi, halaki fir bhi kuch insaano ki rang badlne ki gati ko maat nai de pa rahi thi. Laal rang me chamkte lohe ke saliyo ki karigari se pravesh niyantrit kiya gaya tha. Do insaan andar ki taraf shisho ki bottlo ko idhar udhar kar rahe the. Yuva ne apne jeb me do kagaz ke tukde nikale aur ek usme se us vyakti ke haath me thama diya. Vyakti badi namrata se tukde ko lekar ek chamkti hui shishe ki bottle lekar aaya aur saliyo ke us paar yuva ke haath me de di. Saath me kuch aur kagaz ke tukde bhi wapis diye. Yuva use lekar aaya us se dugni raftar me chala gaya.
Kuch der baad paristhiti karvat leti hai. Saliyo ki sajavat sidhi Saadi lakiro ki tarah aur fike hare rang si mayush hai. Ek aviksit chetna jaisa vajandaar taala laga hua hai bahar ki taraf. Yuva andar ki taraf hai is baar aur char panch log bahar ki taraf thahake laga rahe hai. Yuva apni bachi hui shaktiyo ko jodte hue himmat juta ta hai aur kuch alfaz nikal jate hai. Ek adhikari aata hai salakho ke paas. Yuva fir se jitne bhi kaagaz ke tukde the sab use arpit kar deta hai, par is baar saliyo ke us paar se. Adhikari usi thekedar ki mafik haste hue tukde grahan kar leta hai. Tala khulta hai, aur yuva lambi saans letkar bas chal padta hai vaha se.
Gali me juto ko ghasit te hue chalne ki koshish ab bi jari thi. Baarish kuch kam hui fir bi bhig raha tha woh yuva. Usi bich ek sarkari daftar ke angan me aasra leta hai. Waha use wohi fakir betha hua Milta hai. Yuva bina kuch bole cement ki theli se bani hui kaalin pe birajta hai. Fakir use fir se gehri nazar se dekhta hue muskurara hai. Ek pudiya nikalta hai jhole me se aur yuva ko deta hai. Yuva use lekar haath ponchte hue khane lagta hai. Aakhir me murzaye fool ki tarah, silvate pade hue pudiya ke kagaz ko kholta hai to tel ke dhabbo me kuch dikhayi deta hai. Kagaz arthik mudra ke chalan ke hubahu Chitra prastut kar raha tha, nichd kisi kitab ka ka visleshan tha jisme chote akshar me likha tha "Think and grow rich". Ek kone me kuch panktia likhi hui thi. Shirshak tha "Madhushala". Yuva kagaz ke tukde ko maslte hue fakir ko dekhta hai. Fakir ab bi wohi mukt Nirmal hasya bikher raha tha. Yuva hasta hai. Par is baar digitally suniyantrit ki hui yojna ke tahet nai, bina hasne ki koshish kiye, bas fakir ke bikhre hue hasya ke tukde samete has padta hai.

Copyleft © Ghumantu

Tolerance

Kodvu ke junglo me basa hua ek kasba. Savere hote hi ahladak nazara. Paschimi ghat ki pahadiya jaise hari chadar odhe bethi hai aur shardi me ubasi lete hue sanso se niklta hua dhnua. Sahelani dhund ko mehsus karte to aisa lagta jaise pahadi tulsi ke patte chabakar taza hava de rahi ho. Bazar me halki si chehal pahal ke bich tejana aur masale ki bikri karti hui dukane.
Raat ko yahi Bazar shant sa lagta hai. Kuch sarkari bus yatayat ke liye khadi hui aaram farma rahi hai. Thodi bahot battiya jameen pe jal rahi hai Jo aasman ke jagmagate taro se barabari ka dava karti ho mano. Ek ghumantu kuch khojte hue inhi galiyaro me aa pahoncha. Nukkad pe do vyakti ko khade dekh pucha "Bhaisaab, yaha khana kaha milega aas paas? " samne palat kar tasalli karte hue woh vyakti ne pucha "khana"? Aur fir isharo se samjaya jisme tin manjila makan ka zikra tha. Ghumantu bataye raste ko kanthast karke aakhirkaar pahonch hi gaya.
Ek bada sa darwaza jis ke bayi taraf ek bhari insaan bethe hue the. Haath me kuch rupyo ki gaddi thi jise gin rahe the. Sar pe gol jaalidar topi pehne hue the aur ghumantu ko dekh muskurakar bole " Come come". Ghumantu thoda hichkichaya waha ki diwar pe likha tha woh padh ke, par fir anadar aa hi gaya. Usne nazar daudate hue kone me sthir kiya aur wahi jakar sthan grahan kiya. Aaspaas dekha to khane ki mehfil chal rahi thi jise dekh thoda aswasth hua woh. Isi bich ek hust-pusht lamba insaan aakar samne khada ho gaya. Maze pe ulta rakha hua pani ka glass sidha karke pani bharte hue bola "kya loge sir"? Ghumantu aas paas dekh kar thoda bechen ho raha tha Jo uske kanpte hotho se jhalak raha tha. Usne dabe hui awaaz me pucha "kuch veg milega?? " woh vyakti ghumantu ke gale me mala aur haath pe bandhe dhago se hi samaj gaya ki kya chal raha hai uske dimag me. Woh muskueate bola "2 minute bethie" . woh wapis aaya aur bola chaliye. Upar dusri manzil ki sidhiya chadhne laga aur piche hi ghumantu. Upar aate hi ek chota sa kaksh tha Jo teen baju se bandh tha. Usne ghumantu ko bethne ke liye bola aur kaha " sir ye alag jagah hai jaha log pine aate hai" ghumantu samaj gaya ki yaha madirapaan karne log aate hai. Usne kaha" aap aaram se bethie yaha sir. Rice chalega? " apni gardan hilate hue ghumantu ne ha bola. Kuch hi der me khana le aaya woh. Ghumantu ne itminaan se khaya aur bill dene ko kaha. Aakhir me saunf ka zayka lete hue ghumantu ne pucha "Naam kya hai tumhara"? Jawab dete samay kuch pal woh ruk gaya aur fir uski ankho me ek chamak aur chehre pe sukun tha. Woh dhire se bola "Mai church jata hu sir " dono muskuraye. Ghumantu kshobh me has pada. Sidhi utar ke jab niche aaya to woh topi vale janab puch rahe the " food?? Good na?? " Ghumantu ne angutha uthate ishara kiya. Bahar niklte samay ghumantu kuch sun ke khilkhilakar hasa. Koi mahanubhav subah ke akhbaar ki kuch baasi surkhiya gunguna rahe the "Intolerance rising"

पानी

हीमालय- प्राक्रुतीक एवम संस्क्रुतीक सम्न्वय। अनुभुति मानो आह्लादक। जैसा विशाल पहाड, वैसे ही स्वभाव के प्राणी और सामाजीक प्राणी।
एक घुम्ंतु यात्रा करते हुए यहां आ पहोंचा। कुछ प्रदेश घुम्ने के बाद यहां देखा तो नझारा बेहतरीन था। दुर बर्फ़ में लदे हुए पहाड, जैसे कि चोक्लेट पेस्ट्री पे सफ़ेद क्रीम डाल सजाया हो। निचे देवदार के पेड कि सेना र्र्र्क्षा मे तैनात। सांप सीढी जैसी काली और खाली सडके। शाम का वक्त था और बारिश् अपना पुरा जोर लगाकर बरसने लगी।
घुम्ंतु को दुर से कुछ रोशनी दिखाइ पडी और वोह बाझार में पहोंचा। कुछ किरदार अपनी भुमीका निभा रहे थे इस दुनीया में। । ज्यादातर लकडे की बनी दुकाने दिखाइ पड रही थी। ताझा सब्जी और फ़ल महिला के हाथ् से चुनकर टोक्र्री मे जा रहे थे और अपने चुनाव से आने वाली जीत की खुशी महीला के चेहरे पे छलक रही थी। पास ही से कुछ तलने की खुश्बु आ रही थी। जीग्नाशा वश घुम्ंतु ने जाकर देखा तो गर्मा गर्म पकोडे तैयार हो रहे थे। एफ़.डी.आइ. में निवेष्को को जैसे छुट दी जाति है वैसे ही घुम्ंतु के मुंह से पानी छुटा और वोह सीधा गया ठेले पे। मालीक ने अन्दर आते ही बोला "आओजी आओ, क्या खाना पसंद करोगे?" घुम्ंतु ने अप्ने दोनो हाथ को मसलते हुए कहा एक प्लेट पकोडे मील जाते तो बढीया होता। मालीक ने हंसते हुए कहा "ओ जी क्यो नही, अभि मिल जायेंगे"।पकोडे खाते समय मालीक ने पूछा "ज्यादा तेझ तो नही है ना भाइसाब?"। घुम्ंतु बोला "मिर्चि ठीक है। और बताइए इस जगह के बारे में?" मालीक मूस्कुराते हुए बोला "बस पहाडी इलाका है और क्या" घुम्ंतु जब आखिर मे पैसे चुकाने गया तब मालीक बोलता है "और कोइ सेवा भाइसाब?" घुम्ंतु केहता है "बस इतना बता दिजिये कीराने की दुकान कहा है?" मालीक बोला "ओ जी इसी लाइन में तीसरी दुकान है अपने भट्ट जी की और उनसे आपको बढीया जानकारी मील जायेगी"। एक कम बस्ती वाले कस्बे मे सब एक दुस्र्रे को अछ्छी तरह पेह्चानते है।
भट्ट किराना स्टोर। मोल की चकाचौंध से कही ह्टके साधारन सा व्यापार का स्थल जहां काउंटर की भी लक्शमन रेखा नही थी। अन्दर प्रवेश करते ही थोडा सा हिस्सा बिल्कुल खाली जहां गद्दि बिछाए हुइ थी बेठ्ने के लिये। एक तरफ़ कोट, पयजामा, सर पे गोल टोपी और नजर के चश्मे लगाये सज्जन बेठे हुए थे। अन्दर एक नौजवान कुछ सामान ठीक कर रहा था। आइए बैठिए, क्या सहायता कर सक्ता हुं आपकी? येह पेह्ले शब्द थे उनके। घुम्ंतु ने बैठ्ते हुए बोला " एक शेवींग रेजर चहिये"। सज्जन बोले नौजवान से "एक शेविंग रेजर लाना जरा"। नौजवन फ़ुर्ती से रेजर लेके आया और निचे रखा। घुम्ंतु देख्ते हि बोला "जी ये नही चाहीए। मै तो अलग ब्रांन्ड इस्तेमाल करता हुं"। सज्जन बोले "ये शेवींग के लिये हि है और इस से कटेगा भी नही। हमारे पास यही है, बाकी आप की मर्झी"। घुम्ंतु ने आखिर ले लिया और बात्चीत को जारी रखा। कुतुहल मे घुम्ंतु ने पूछा "वैसे आप ये सामान शेहर से लाते होंगे ना?' सज्जन बोले "हां। महिने मे एक बार जाते है तब दुकान बन्ध रेहती है। पुरा दीन लग जाता है आने जाने मे"। घुम्ंतु उत्साह मे केह्ता है "अछ्छा ये बताइए जब आप वहां जाते हो शेहर मे, तो कैसा मेह्सुस होता है? क्या ऐसा विकास यहां पे भी होना नही चाहीये?" अपनी बात पुरी करते करते घुम्ंतु खांस ने लगा। सज्जन ने नौजवान को पानी लाने कॊ कहा। नौजवान गिलास मे पानि लेकर आया और घुम्ंतु को दिया। घुम्ंतु ने पानी के घुंट पिते हुए नौजवान को धन्यवाद कहा और अपना प्रश्न सज्जन से किया। सज्जन कि नजर के चश्मे के अन्दर दबी हुइ आंखे, आंखो को साथ देती हुइ चेहरे कीझुर्रिया , एक लम्बी सांस लेकर गीलास कि और देख के जवाब दिया "विकास? अब ये पानी भी बिकाउ हो गया है " घुम्ंतु कुछ नही बोला। एक चुप्पि सी छा गयी माहोल मे उस्के बाद.
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Saturday, September 5, 2015

Curfew

Curfew

Woh subah roj ki tarah nahi thi. Raste par shorgul, bhid bhadaka aur dukan sari ab bhi khuli nahi thi. Sadke bi khali lag rahi thi bina gaadio ke. Bachhe khush ho rahe the kyon ki school nai jana tha. Unhe kya pata tha chutti kyo thi aaj. Police ki gaadiya kuch bas aa ja rahi thi aur kuch utsahit log jo milkar vichar vimarsh kar rahe the unhe bhaga rahi thi.
In sab ke bich ek insaan chala ja raha tha sadak pe- Bhura. Woh har dukaan ko dhyan se dekhte hue ja raha tha. Ratse me Pipal ke ped niche kuch log apni motorcycle ke saath khade the. Ek naujavan sabko suchna de raha tha garv ke saath "Aaj to do sarkari bas jala di aur bi sara chakkajam kar diya, maza aa gaya ". uski baato se lag raha tha jaise manav jagat ke liye bahot bada yogdaan diya ho. Wohi ek adhed bola usi mandal me se "Ye to kuch nai hai, jab ham log college me the, Tab to Sare sarkari daftar me bhi todfod macha dete the". Wohi ek yuvak Grahak Suvidha kendra me sampark karne ki koshish kar raha tha jaha se jawab aaya " sarkari Agency ke nirdesh anusar aapke kshetra me data aur sms seva uplabdh nahi hai. Hamari jald se jald seva shuru karne ki aasha hai". Phone kaat te hue yuvak ne kaha "Arre yaar. Abhi whatsapp bhi nai chal raha, nai to pura photos sab ko bhej deta. Pata to chale sarkar ko ham me bhi kitna dam hai. Ha ha". Charcha gambhir hone lagi. Ek budhijivi sab ko samjane lage "Ye sab rajkaran hi hai. Ye digital Yug me sara power telecom ke paas hai. Aur telecom sarkar ke haath me. Sare movement ko kaise dabana hai ye unhe achi tarah aata hai. Capitalism me yahi hota hai". Ek majdoor jo kisi dusre rajya se aaya hua tha roji roti kamane woh toli ko dekh puchne laga "Aaj Strike hai kya?" Sab log hasne lage. Ek mahashay bole "Ye lo. Duniya se bekhabar. Yaha aag lagi hui hai aur ye puch rahe hai strike hai?. Ha ha. Ha bhai aaj bandh hai. Ghar jao wapas". Woh majdoor apni mayushi antar man me chupakar chala gaya. Wohi sab ki nazar Bhura pe padi. Ek hoshiyar vyakti ne haath se ishara karte hue dhaad mari "Oye..Kaha ja raha hai???" Bhura nazdik aake bola "Dairy khuli hogi aas paas kahi?" Wohi utsahit yuvak ne jawab diya "Abe murakh. Aaj bandh hai sab. Kuch nai khula hai. Ghar ja nai to kuch hi der me police logo ko danad maar haga degi" Bhura ja hi raha tha tab ek sajjan ne kaha "Agli gali me tisra ghar hai. Uski dukaan ka shutter bandh hoga. Par baju me chota darwaja khol ke jana, piche hi uska ghar hai" Bhura dhanyvad keh ke nikla aur dairy pe pahoncha. Usne 15 rs ka Doodh liya aur chupchap apne ghar wapis aaya.
Ghar me ghuste hi myaw myaw ki awaaz aane lagi. Bhura doodh ki theli daan se hi tod bahar rakhi katori me sara doodh daal diya. Uski patni bahar aake gusse me boli "Sheher me dange ho rahe hai aur aap bina soche ye lene gaye the". Bhura kuch nai bolta bas billi ko doodh pite dekhte rehta hai. Jab patni chillake kehti hai "Curfew laga hai, smajte ho na iska matlab?". Bhura kehta hai "Mai to samjta hu, par ye bezubaan billi kaha samjhegi. Kabhi sochta hu ham jyada samjdaar hue insaan bankar ya jaanvar hue jyada samajdar bankar".

Copyleft © Jigar Raval

Monday, March 23, 2015

Natueco Farming - Amrut Kheti

"Mat Kar Maya ko Ahankar, Mat kar kaya ko Abhimaan, Kaaya gaar Se Kaachi,
Kaaya gaar se kachi, jaisa osra Moti,
Jhonka Pavan Ka lag jaye, kaaya dhul ho ja si"
                                                                         - Kabir

"How the Plants in Forest survive without any Fertilizers or chemicals? A fundamental question. Natueco farming science is holistic Approach Lifestyle farming. In harmony with Nature,

Deepak Suchde ji (Baba) has developed the beyond organic concept of "Amrut Kheti" after his vast experience. His contribution to save the nature is spellbound. if you are thinking on how to sustain with minimum resources in Agriculture? Amrut Kheti is the answer.



Nemavar, MP is Center point of Rewa (Narmada). Sharan is 5 kms away from Nemawar. The place has natural energy in surrounding.


Rameshbhai, The local hero. He has done farming and taken crop for one year on the banks of Narmada with single tool. And that to without any fertilizers.




Pratik and Kunal both were worth meeting. The Sharing of ideas at the end of the day was thought provoking.From herbal Tea to Shatur (Strawberry of poor), Cooking meal to Listening Kabir. Every moment was mesmerizing. Vatsal, your variety of dishes is delicious. 
                                             


From Punning to making Amrit jal, Ganga ma mandal to piping in 10 acre i learnt as per my understanding. Dipak Dada asked me to work for 2 days in farm, and in return he gave me money for fuel for next destination. First hard earned money always feels great.



When you are on right path, Destiny plans in way you to meet Good Samaritan. The experience at Sharan makes you to come back again.

Journey onward starts now! 






Sunday, March 15, 2015

Saha-Astitva

We exist in this world along with Nature. Co-existentialism is middle way of idealism & materialism. Too heavy huh.. if you get it right, its as easy as cakewalk.



Manav Chetna Vikas Kendra : Pivdai-  18 kms from Indore. Group of families are living together to experience and study co-existentialism. "Swavlamban is the key concept they are working to achieve saha-Astitva. They grow vegetables, grain, fruits, have "Gau-shala". Basic needs are satisfied from the place only.



Engineers do think out of the box. Not stereotyping them :P But in this case it is true. Ajay Dayma Ji- who is a n engineer quit his job started this center with his wife Mrs. Varsha Dayma. Both are lovely people.









Every member of family who lives here works in center. They have different responsibility to perform. But when it comes to help they are always open. Each family is from different parts of India. They Plant, cook,eat live together. They learn new skills and not just survive but grow everyday.




I was fortunate to be part of "Fasal katai" of wheat crop. Everybody learned how to perform that and by the end of the day mastered it :)



When discussion continued with Ajay ji on Jhabua issue, he narrated this is very small issue. Take example of Punjab. It is very rich in Agriculture and so on Wealth. Now a days Drugs is biggest issue they are fighting with. So if Jhabua people take more steps towards Agriculture and cultivate more is not going to solve the issue. On the contrary, Bihar is a state where income is very low where crime rate is high because of survival issue. Ultimately, when you don's have wisdom what basic needs are and what you compromising on that is key to suffering.

















As the name goes, the efforts here are for enlightenment. When discussions are healthy, outcome is meant to be fruitful. It was Lovely time with all. Thanks for the Gifts and care.










Journey is not just merely on the roads or to places. it finally your inner journey to contribute in making this planet peaceful.

Hence, the determination is strong to do so.



Next Destination, where destiny takes :)

Wednesday, March 11, 2015

Bhagoriya

It's always enriching going back to roots. Festival, colors, People, Tribe, culture, Love.




Bhagoriya- 7 days festival prior to Holi celebrated by Bhil and Bhilala communities in Madhya Pradesh. The Festival Bhagoriya is mass swayamvar where people gather in large number and initiate the process of finding Bride and Groom. Meanwhile if they have already chosen bride, the Groom apply Gulal on bride's face in Bhagoriya. Otherwise they propose the unknown girl by doing so or in some case their friends or family approaches girl's family if boy likes her. The festival literary means "Bhag"-run away. The festival has also Open market of vegetables, fruits, toys, jewelry, Rides and all. Full on Mela. It is celebrated at different places in Jhabua and Alirajpur District of MP. Both are border district which shares boarder with Gujarat and Maharashtra.
















Tribals are roots of India. They are still not fully modernize and thus they are attached to mother nature which they worship. Now a days, people are migrated to Guajarat for livelihood. Basically all tribal people are in to Agriculture. They take only once season crop and then migrate to Gujarat for Labor Work. On Bhagoriya, they come down to their respective place in MP and spend all money they have earned.






I was fortunate to witness it in four places. Pitol & Kalyanpura in Jhabua, Sondva and Jhobut in Alirajpur. Even both district have some difference in celebration Bhagoriya. Jhabua district has more Mela culture where Rides are more. On the other hand Alirajpur has more people interaction than Rides. Also they come in group with same dresses (And we thought we celebrate Group day in colleges only :P). In bhagoriya they were all silver ornaments as an expression to show how much they have. There are Self made Toll booth on the way. Basically the boys stop you when you are passing from their village and ask for 10 rs. Once you give 10 rs, They will clear your way. This is done only during Holi Time.





They get married at the age of 15-18. The reason behind getting married early is strange. If a boy run away with girl then boy's family has to pay 3 to 4 lacs to Girl's family. To avoid the situation they get married early.










They drink Tadi which is sweet when fresh and sour later. Liqour is major issue of distruction in this rigion. Imagine a 118 crore auction amount for liquor shop license. Mostly to supply in Gujarat as its dry state and secondly for their own consumption.
The Jhabua-Bhagoriya journey is only possible because of Bhukan Sinh. Teacher at Vanvaasi Ashram. Interacted with students from sixth to 10th. They are more aware of the situation. I hope they are change Agent for better tomorrow. Spent lovely time while staying with them. We went to holika Dahan where they dance with dhol around holi.finally bid goodbye to them.





Next destination- where curiosity takes :)