Friday, May 13, 2016

सफ़र

जिंदगी confirm न हुई तो क्या हुआ, RAC ही सही,
थोडा तुम सिकुड़ लो, थोडा हम सिकुड़ ले,
एक उम्र की ही तो बात है, युंही बशर हो जानी है

Sunday, April 10, 2016

चड्डी पहन के फूल (कमल) खिला है

(इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है , इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से या घटना से कोई संबंध नहीं है)


ये कहानि है एक अव्वल दरजे के  घुमक्कड़ की.

उसका जन्म भारत के एक गाँव में हुआ था. बचपन से ही ट्रेन को ताकता रहता था और सोचता था कंहा जाती होगी, ये जो लोग आ रहे है कंहा से आते होंगे. पिताजी की चाय की टपरी थी जिस से आसानी से प्रवेश मिल जाता था स्टेशन पे.

जब वोह गाँव में खेला करता था तो भी बहार जाने की ख्वाहिस लोगो को बताया करता था . एक दिन उसकी नजर एक टोली पर पड़ी. सब चड्डी पहने हुए थे और मस्ती से खेल रहे थे . उस बाल का भी मन हुआ और वोह भी खेल ने लग गया. वहा खेल के बाद बड़े मज़ेदार किस्से कहानिया सुनाते थे. बालक और भी प्रसन्न हुआ. एक दिन उसे पता चला की इस टोली में शामिल होने से खूब घुमने को मिलेगा. उसने फ़ौरन मन बना लिया टोली में शामिल होने का. बस चड्डी पहनी और निकल पड़ा. धीरे धीरे उसने देखा अगर उसे आगे बढ़ना है तो किस्से कहानी लोगो को सुनाने पड़ेंगे तब जाकर उसे घुमने का अवसर मिलेगा. बस उसको तो वही चाहिए था. धीरे धीरे कहानीकार भी बन गया. बड़ी मनभावक कहानी सुनाता था. उसका काम चल पड़ा. टोली में रोज़ वर्जिश करना, नयी नयी जगह जाना, हसी मजाक , ठहाके और कहानिया . उसे तो मानो स्वर्ग मिल गया.

पर घर वालो को चिंता हो रही थी . अब लड़का बड़ा हो गया था, शादी के लायक. तो सब ने सोचा की इसकी शादी करा देते है तो घर पे वापस आ जायेगा और यंही रहेगा . उन्हें क्या पता उस घुमक्कड़ के खुराफाती दिमाग में क्या चल रहा है . फिर भी शादी हुई. घुमक्कड़ का मन नही  लग रहा था . वोह चला गया किसी को घर पे बिना बताये. पहाड़ उसे बहोत अच्छे लगते थे . कुछ साल वंही गुजरे . फिर वंही कुछ काम मिल गया कहानी और कथा कहनेका . वोह भी किया. आखिर में टोली का जो मुख्या था उस के पास पहोंच गया . वहां से पुरे देश घुमने की योजना बनायीं और निकल पड़ा घुमने .

पर अब देश से बात बनी नहीं. उसे तो दुनिया भर घूमना था. उसको पता चला की टोली में तो सिर्फ देश ही घूम सकते है . पर इस टोली के ही कुछ दोस्त लोग थे जो दूसरी टोली में काम करते थे. दूसरी टोली का मुख्य काम था सब को कमल के हार पहनाना और अपनी टोली में शामिल कर लेना . बस उसके साथ साथ किस्से कहानी सुनाना, देश विदेश घूमना . बस यही तो चाहिए था घुमक्कड़ को. वोह फट से इस टोली में शामिल हो गया. और उसने पाया की विदेश जाने में खूब तैयारी करनी पड़ती है और मेहनत भी. बचपन से मेहनती तो था ही . लग गया परिश्रम करने . उसे लगा की अब घर जाकर ही काम करना चाहिए. वह उसे अच्छा अनुभव था कहानी सुनाके लोगो को मंत्रमुग्ध करने का . अपने राज्य में जाकर वह मुखिया बन गया . अब देखा की यहाँ कुछ साल बितान है तो क्या किया जाये . उसे गाँव का बचपन याद आया. वह हमेशा एक तरकीब किया करता था . जब भी उसे खेल में सब का मुखिया बन ना होता था तो वोह दो दल के लोगो में कुश्ती करवाया करता था. और जो सब से बड़ी संख्या में दल होता था उसे बहोत मदद भी करता था जीतने में . बस फिर क्या . बड़ी संख्या उसे मुख्या बनाये रखती . यही तरकीब उसने राज्य में भी अपनाई और अरसे तक मुख्या बना रहा.

उस समय काल में उसने विदेश जाने की तैयारी भी की. पर कुछ पर्ची  जो जरुरी थी वोह उसे नहीं मिली. बात  ये थी की कुश्ती की वजह से उसकी बदनामी हो गयी थी. सब को डर था ये हमारे वहा भी दंगल करवा देगा . अब अपनी छवि को सुधारना था. उसने फिर तरकीब निकाली . जब खेल का मुख्या हुआ करता था बचपन में तो सबको उसके दोस्त के बारे में बोला करता था . बहोत ही अज़ीज़ दोस्त था उसका. एकदम साफ़ सुथरा . अच्छी भाषा बोलने वाला . लोगो के लिए सड़क बनाता था , पानी पहोंचाता था , मकान बनवाता था . लोगो को बड़ा प्रिय था विकास. पर एक बात उनको नही पता थी. ये विकास बहोत ही चालाक था . वोह बहला फुसला कर लोगो से पैसे एंथ लेता था और फिर उसी में से उनके काम करता था. और एक भारी बचा हुआ हिस्सा घुमक्कड़ को देता था. घुमक्कड़ एक भी पैसा नहीं लेता था उसमे से , वोह सीधा अपनी टोली में जमा करवा देता था. दोनों टोली में . क्योंकि उसको तो विदेश जाना था .


घुमक्कड़ ने अपने वहाँ देखा की कुछ विकास के दोस्तों की भी एक टोली थी. वोह लोग व्यापर करते थे . उन्होंने घुमक्कड़ से दरख्वास्त रखी की आप भी विकास के दोस्त है हम भी. चलो कुछ साथ मिलके काम किया जाय. बस फिर वोह शुरू हो गया. विकास के नाम पे अब व्यापारियों को खूब मदद करने लगा और वादा भी लिया की समय आने पर उसे वापिस वोह लोग मदद करे. विकास के तो और भी दोस्त थे विदेश में .अब उसने ये भी सोचा विदेश में उसकी जान पहचान तो होनी चाहिए . बस सारे विकास के दोस्तों को बुलाता रहा अपने राज्य में . उनसे खूब दोस्ती बढाई. अब बारी थी देश का मुख्या बन ने की . उसने अपनी ही टोली के लोगो में से कुस्ती कर प्रबल दावेदार बन गया . अब सामने वाले दल में कोई जोर नहीं बचा था . सब विकास से प्रभावित थे ही . उसने सब किस्से कहानी से लोगो में विकास को ही अंतिम सुख बताया. लोग भाव विभोर होके विकास को देख ने के लिए तरस गए. जब की घुमक्कड़ ये बताता रहा की विकास चारो तरफ दिखेगा . बस  देश भर ने उसे विकास  के मोह में आकर मुख्या बनाया . उसमे विकास के व्यापारी मित्रो ने खूब मदद भी की,

आज वोह देश का मुख्या आखिर बन ही गया . अब तो उसे विदेश जाने की पक्की पर्ची भी मिल गयी . क्योकि विकास के दोस्त सारे देशो के मुख्या भी तो थे . अब वोह दुनिया भर की शैर करता है . अपनी कहानी, किस्से अभी भी लोगो को सुनाता है . विकास को तो अब भी किसी ने देखा नहीं है. कोई कहता है विकास है ही नहीं  दुनिया में . पर घुमक्कड़ आज भी अपनी मन की बातो से लोगो को मना लेता है की विकास है. इसी के साथ उसके जीवन में अथाग परिश्रम के बाद आज वोह अपनी सपनो की जिंदगी जी रहा है. विदेशो में घुमना , तस्वीरे खींचना , कथाकार बन जाना , व्यंजनों का स्वाद लेना, नयी नयी वेश भूषा , नए विकास के दोस्तों से परिचय . और तरकीब वही है दो दल को कुश्ती करा रहा है. जो ज्यादा संख्या में है उसको चुपके से मदद कर देता है ताकि वोह मुख्या बना रहे . और इस कोशिश में उसकी मदद चड्डी वाली टोली , कमल का हार पहनाने वाली टोली और विकास , ये सब उसके साथी है.

चड्डी पहन के फूल (कमल) खिला है , फूल  खिला है..... देश विदेश में बात चली है , चड्डी पहन के फूल खिला है....


Pinjara

Raat hone ke saath sama bhi kajal ki tarah gehra ho raha tha. Baarish ki boonde damar ki sadko pe girte hi malhar raag gunguna rahi thi. Chand gaadiya, do pahiya, cycle aur bagal me kuch chattriya chal rahi thi. Kudrat ki banaye vishram sthal ki aad me kuch log vicharo ke shailab me baarish ki tivrata kam hone ka intezar kar rahe the.
Usi me se raste pe ek gaadi sanp sidhi khelte hue aage badh rahi thi. Shihe par thirkte vipers andar baj rahe radio ke saath taal mila rahe the. Steering ko ek haath se disha nirdesh karte hue yuva apni dhun me ja raha tha. Ungliyo se battiya kam jyada karne ke saath aas paas nigahe fer kuch dhundh raha tha. Khushiyo ki window shopping pe nikle yuva ko aakhir kar manzil mil hi jati hai. Sadak kinare gaadi rok niche utarata hai. Bhag ke sidha chajje ke niche khada ho jata hai aur bina piche mude ek button dabata hai jis se gaadi me kuch dhvani aur timtimati roshani hoti hai, Jo gaadi surakhsit hone ka sanket deti hai. Paas me dukan ke baramde pe ek shakhs betha hai. Shehro ki naaliyo me bhigokar nikale hue kapde, rajtantra ki tarah ulze hue ghumrale aur sarkari vaydo samaan lambe baal, bhrashtachar jaisi badhi hui daadhi aur nyay vyavastha jaisa kamzor sharir. In sab ke bavajud fakiri ki gavahi dete hue chehre pe sufiyana muskaan. Apni gehri ankho se bahot kuch kehte aur sunte hue woh yuva ko dekh raha tha. Pahad si majbut aavaz me kuch shabd nikle uske mukh se "kuch khane ko hai kya?" Yuva tiraskar se jyada kataksh bhari nazaro se dekh haath hilate hue jaise suna hi na ho waise aage badha. Choti choti roshani ki ladiya sab ka swagat karte hue kuch alfaz ke ird gird daud rahi thi. Baar baar girgit ki tarah rand badal rahi thi, halaki fir bhi kuch insaano ki rang badlne ki gati ko maat nai de pa rahi thi. Laal rang me chamkte lohe ke saliyo ki karigari se pravesh niyantrit kiya gaya tha. Do insaan andar ki taraf shisho ki bottlo ko idhar udhar kar rahe the. Yuva ne apne jeb me do kagaz ke tukde nikale aur ek usme se us vyakti ke haath me thama diya. Vyakti badi namrata se tukde ko lekar ek chamkti hui shishe ki bottle lekar aaya aur saliyo ke us paar yuva ke haath me de di. Saath me kuch aur kagaz ke tukde bhi wapis diye. Yuva use lekar aaya us se dugni raftar me chala gaya.
Kuch der baad paristhiti karvat leti hai. Saliyo ki sajavat sidhi Saadi lakiro ki tarah aur fike hare rang si mayush hai. Ek aviksit chetna jaisa vajandaar taala laga hua hai bahar ki taraf. Yuva andar ki taraf hai is baar aur char panch log bahar ki taraf thahake laga rahe hai. Yuva apni bachi hui shaktiyo ko jodte hue himmat juta ta hai aur kuch alfaz nikal jate hai. Ek adhikari aata hai salakho ke paas. Yuva fir se jitne bhi kaagaz ke tukde the sab use arpit kar deta hai, par is baar saliyo ke us paar se. Adhikari usi thekedar ki mafik haste hue tukde grahan kar leta hai. Tala khulta hai, aur yuva lambi saans letkar bas chal padta hai vaha se.
Gali me juto ko ghasit te hue chalne ki koshish ab bi jari thi. Baarish kuch kam hui fir bi bhig raha tha woh yuva. Usi bich ek sarkari daftar ke angan me aasra leta hai. Waha use wohi fakir betha hua Milta hai. Yuva bina kuch bole cement ki theli se bani hui kaalin pe birajta hai. Fakir use fir se gehri nazar se dekhta hue muskurara hai. Ek pudiya nikalta hai jhole me se aur yuva ko deta hai. Yuva use lekar haath ponchte hue khane lagta hai. Aakhir me murzaye fool ki tarah, silvate pade hue pudiya ke kagaz ko kholta hai to tel ke dhabbo me kuch dikhayi deta hai. Kagaz arthik mudra ke chalan ke hubahu Chitra prastut kar raha tha, nichd kisi kitab ka ka visleshan tha jisme chote akshar me likha tha "Think and grow rich". Ek kone me kuch panktia likhi hui thi. Shirshak tha "Madhushala". Yuva kagaz ke tukde ko maslte hue fakir ko dekhta hai. Fakir ab bi wohi mukt Nirmal hasya bikher raha tha. Yuva hasta hai. Par is baar digitally suniyantrit ki hui yojna ke tahet nai, bina hasne ki koshish kiye, bas fakir ke bikhre hue hasya ke tukde samete has padta hai.

Copyleft © Ghumantu

Tolerance

Kodvu ke junglo me basa hua ek kasba. Savere hote hi ahladak nazara. Paschimi ghat ki pahadiya jaise hari chadar odhe bethi hai aur shardi me ubasi lete hue sanso se niklta hua dhnua. Sahelani dhund ko mehsus karte to aisa lagta jaise pahadi tulsi ke patte chabakar taza hava de rahi ho. Bazar me halki si chehal pahal ke bich tejana aur masale ki bikri karti hui dukane.
Raat ko yahi Bazar shant sa lagta hai. Kuch sarkari bus yatayat ke liye khadi hui aaram farma rahi hai. Thodi bahot battiya jameen pe jal rahi hai Jo aasman ke jagmagate taro se barabari ka dava karti ho mano. Ek ghumantu kuch khojte hue inhi galiyaro me aa pahoncha. Nukkad pe do vyakti ko khade dekh pucha "Bhaisaab, yaha khana kaha milega aas paas? " samne palat kar tasalli karte hue woh vyakti ne pucha "khana"? Aur fir isharo se samjaya jisme tin manjila makan ka zikra tha. Ghumantu bataye raste ko kanthast karke aakhirkaar pahonch hi gaya.
Ek bada sa darwaza jis ke bayi taraf ek bhari insaan bethe hue the. Haath me kuch rupyo ki gaddi thi jise gin rahe the. Sar pe gol jaalidar topi pehne hue the aur ghumantu ko dekh muskurakar bole " Come come". Ghumantu thoda hichkichaya waha ki diwar pe likha tha woh padh ke, par fir anadar aa hi gaya. Usne nazar daudate hue kone me sthir kiya aur wahi jakar sthan grahan kiya. Aaspaas dekha to khane ki mehfil chal rahi thi jise dekh thoda aswasth hua woh. Isi bich ek hust-pusht lamba insaan aakar samne khada ho gaya. Maze pe ulta rakha hua pani ka glass sidha karke pani bharte hue bola "kya loge sir"? Ghumantu aas paas dekh kar thoda bechen ho raha tha Jo uske kanpte hotho se jhalak raha tha. Usne dabe hui awaaz me pucha "kuch veg milega?? " woh vyakti ghumantu ke gale me mala aur haath pe bandhe dhago se hi samaj gaya ki kya chal raha hai uske dimag me. Woh muskueate bola "2 minute bethie" . woh wapis aaya aur bola chaliye. Upar dusri manzil ki sidhiya chadhne laga aur piche hi ghumantu. Upar aate hi ek chota sa kaksh tha Jo teen baju se bandh tha. Usne ghumantu ko bethne ke liye bola aur kaha " sir ye alag jagah hai jaha log pine aate hai" ghumantu samaj gaya ki yaha madirapaan karne log aate hai. Usne kaha" aap aaram se bethie yaha sir. Rice chalega? " apni gardan hilate hue ghumantu ne ha bola. Kuch hi der me khana le aaya woh. Ghumantu ne itminaan se khaya aur bill dene ko kaha. Aakhir me saunf ka zayka lete hue ghumantu ne pucha "Naam kya hai tumhara"? Jawab dete samay kuch pal woh ruk gaya aur fir uski ankho me ek chamak aur chehre pe sukun tha. Woh dhire se bola "Mai church jata hu sir " dono muskuraye. Ghumantu kshobh me has pada. Sidhi utar ke jab niche aaya to woh topi vale janab puch rahe the " food?? Good na?? " Ghumantu ne angutha uthate ishara kiya. Bahar niklte samay ghumantu kuch sun ke khilkhilakar hasa. Koi mahanubhav subah ke akhbaar ki kuch baasi surkhiya gunguna rahe the "Intolerance rising"

पानी

हीमालय- प्राक्रुतीक एवम संस्क्रुतीक सम्न्वय। अनुभुति मानो आह्लादक। जैसा विशाल पहाड, वैसे ही स्वभाव के प्राणी और सामाजीक प्राणी।
एक घुम्ंतु यात्रा करते हुए यहां आ पहोंचा। कुछ प्रदेश घुम्ने के बाद यहां देखा तो नझारा बेहतरीन था। दुर बर्फ़ में लदे हुए पहाड, जैसे कि चोक्लेट पेस्ट्री पे सफ़ेद क्रीम डाल सजाया हो। निचे देवदार के पेड कि सेना र्र्र्क्षा मे तैनात। सांप सीढी जैसी काली और खाली सडके। शाम का वक्त था और बारिश् अपना पुरा जोर लगाकर बरसने लगी।
घुम्ंतु को दुर से कुछ रोशनी दिखाइ पडी और वोह बाझार में पहोंचा। कुछ किरदार अपनी भुमीका निभा रहे थे इस दुनीया में। । ज्यादातर लकडे की बनी दुकाने दिखाइ पड रही थी। ताझा सब्जी और फ़ल महिला के हाथ् से चुनकर टोक्र्री मे जा रहे थे और अपने चुनाव से आने वाली जीत की खुशी महीला के चेहरे पे छलक रही थी। पास ही से कुछ तलने की खुश्बु आ रही थी। जीग्नाशा वश घुम्ंतु ने जाकर देखा तो गर्मा गर्म पकोडे तैयार हो रहे थे। एफ़.डी.आइ. में निवेष्को को जैसे छुट दी जाति है वैसे ही घुम्ंतु के मुंह से पानी छुटा और वोह सीधा गया ठेले पे। मालीक ने अन्दर आते ही बोला "आओजी आओ, क्या खाना पसंद करोगे?" घुम्ंतु ने अप्ने दोनो हाथ को मसलते हुए कहा एक प्लेट पकोडे मील जाते तो बढीया होता। मालीक ने हंसते हुए कहा "ओ जी क्यो नही, अभि मिल जायेंगे"।पकोडे खाते समय मालीक ने पूछा "ज्यादा तेझ तो नही है ना भाइसाब?"। घुम्ंतु बोला "मिर्चि ठीक है। और बताइए इस जगह के बारे में?" मालीक मूस्कुराते हुए बोला "बस पहाडी इलाका है और क्या" घुम्ंतु जब आखिर मे पैसे चुकाने गया तब मालीक बोलता है "और कोइ सेवा भाइसाब?" घुम्ंतु केहता है "बस इतना बता दिजिये कीराने की दुकान कहा है?" मालीक बोला "ओ जी इसी लाइन में तीसरी दुकान है अपने भट्ट जी की और उनसे आपको बढीया जानकारी मील जायेगी"। एक कम बस्ती वाले कस्बे मे सब एक दुस्र्रे को अछ्छी तरह पेह्चानते है।
भट्ट किराना स्टोर। मोल की चकाचौंध से कही ह्टके साधारन सा व्यापार का स्थल जहां काउंटर की भी लक्शमन रेखा नही थी। अन्दर प्रवेश करते ही थोडा सा हिस्सा बिल्कुल खाली जहां गद्दि बिछाए हुइ थी बेठ्ने के लिये। एक तरफ़ कोट, पयजामा, सर पे गोल टोपी और नजर के चश्मे लगाये सज्जन बेठे हुए थे। अन्दर एक नौजवान कुछ सामान ठीक कर रहा था। आइए बैठिए, क्या सहायता कर सक्ता हुं आपकी? येह पेह्ले शब्द थे उनके। घुम्ंतु ने बैठ्ते हुए बोला " एक शेवींग रेजर चहिये"। सज्जन बोले नौजवान से "एक शेविंग रेजर लाना जरा"। नौजवन फ़ुर्ती से रेजर लेके आया और निचे रखा। घुम्ंतु देख्ते हि बोला "जी ये नही चाहीए। मै तो अलग ब्रांन्ड इस्तेमाल करता हुं"। सज्जन बोले "ये शेवींग के लिये हि है और इस से कटेगा भी नही। हमारे पास यही है, बाकी आप की मर्झी"। घुम्ंतु ने आखिर ले लिया और बात्चीत को जारी रखा। कुतुहल मे घुम्ंतु ने पूछा "वैसे आप ये सामान शेहर से लाते होंगे ना?' सज्जन बोले "हां। महिने मे एक बार जाते है तब दुकान बन्ध रेहती है। पुरा दीन लग जाता है आने जाने मे"। घुम्ंतु उत्साह मे केह्ता है "अछ्छा ये बताइए जब आप वहां जाते हो शेहर मे, तो कैसा मेह्सुस होता है? क्या ऐसा विकास यहां पे भी होना नही चाहीये?" अपनी बात पुरी करते करते घुम्ंतु खांस ने लगा। सज्जन ने नौजवान को पानी लाने कॊ कहा। नौजवान गिलास मे पानि लेकर आया और घुम्ंतु को दिया। घुम्ंतु ने पानी के घुंट पिते हुए नौजवान को धन्यवाद कहा और अपना प्रश्न सज्जन से किया। सज्जन कि नजर के चश्मे के अन्दर दबी हुइ आंखे, आंखो को साथ देती हुइ चेहरे कीझुर्रिया , एक लम्बी सांस लेकर गीलास कि और देख के जवाब दिया "विकास? अब ये पानी भी बिकाउ हो गया है " घुम्ंतु कुछ नही बोला। एक चुप्पि सी छा गयी माहोल मे उस्के बाद.
Copyleft © Jigar Raval

Saturday, September 5, 2015

Curfew

Curfew

Woh subah roj ki tarah nahi thi. Raste par shorgul, bhid bhadaka aur dukan sari ab bhi khuli nahi thi. Sadke bi khali lag rahi thi bina gaadio ke. Bachhe khush ho rahe the kyon ki school nai jana tha. Unhe kya pata tha chutti kyo thi aaj. Police ki gaadiya kuch bas aa ja rahi thi aur kuch utsahit log jo milkar vichar vimarsh kar rahe the unhe bhaga rahi thi.
In sab ke bich ek insaan chala ja raha tha sadak pe- Bhura. Woh har dukaan ko dhyan se dekhte hue ja raha tha. Ratse me Pipal ke ped niche kuch log apni motorcycle ke saath khade the. Ek naujavan sabko suchna de raha tha garv ke saath "Aaj to do sarkari bas jala di aur bi sara chakkajam kar diya, maza aa gaya ". uski baato se lag raha tha jaise manav jagat ke liye bahot bada yogdaan diya ho. Wohi ek adhed bola usi mandal me se "Ye to kuch nai hai, jab ham log college me the, Tab to Sare sarkari daftar me bhi todfod macha dete the". Wohi ek yuvak Grahak Suvidha kendra me sampark karne ki koshish kar raha tha jaha se jawab aaya " sarkari Agency ke nirdesh anusar aapke kshetra me data aur sms seva uplabdh nahi hai. Hamari jald se jald seva shuru karne ki aasha hai". Phone kaat te hue yuvak ne kaha "Arre yaar. Abhi whatsapp bhi nai chal raha, nai to pura photos sab ko bhej deta. Pata to chale sarkar ko ham me bhi kitna dam hai. Ha ha". Charcha gambhir hone lagi. Ek budhijivi sab ko samjane lage "Ye sab rajkaran hi hai. Ye digital Yug me sara power telecom ke paas hai. Aur telecom sarkar ke haath me. Sare movement ko kaise dabana hai ye unhe achi tarah aata hai. Capitalism me yahi hota hai". Ek majdoor jo kisi dusre rajya se aaya hua tha roji roti kamane woh toli ko dekh puchne laga "Aaj Strike hai kya?" Sab log hasne lage. Ek mahashay bole "Ye lo. Duniya se bekhabar. Yaha aag lagi hui hai aur ye puch rahe hai strike hai?. Ha ha. Ha bhai aaj bandh hai. Ghar jao wapas". Woh majdoor apni mayushi antar man me chupakar chala gaya. Wohi sab ki nazar Bhura pe padi. Ek hoshiyar vyakti ne haath se ishara karte hue dhaad mari "Oye..Kaha ja raha hai???" Bhura nazdik aake bola "Dairy khuli hogi aas paas kahi?" Wohi utsahit yuvak ne jawab diya "Abe murakh. Aaj bandh hai sab. Kuch nai khula hai. Ghar ja nai to kuch hi der me police logo ko danad maar haga degi" Bhura ja hi raha tha tab ek sajjan ne kaha "Agli gali me tisra ghar hai. Uski dukaan ka shutter bandh hoga. Par baju me chota darwaja khol ke jana, piche hi uska ghar hai" Bhura dhanyvad keh ke nikla aur dairy pe pahoncha. Usne 15 rs ka Doodh liya aur chupchap apne ghar wapis aaya.
Ghar me ghuste hi myaw myaw ki awaaz aane lagi. Bhura doodh ki theli daan se hi tod bahar rakhi katori me sara doodh daal diya. Uski patni bahar aake gusse me boli "Sheher me dange ho rahe hai aur aap bina soche ye lene gaye the". Bhura kuch nai bolta bas billi ko doodh pite dekhte rehta hai. Jab patni chillake kehti hai "Curfew laga hai, smajte ho na iska matlab?". Bhura kehta hai "Mai to samjta hu, par ye bezubaan billi kaha samjhegi. Kabhi sochta hu ham jyada samjdaar hue insaan bankar ya jaanvar hue jyada samajdar bankar".

Copyleft © Jigar Raval

Monday, March 23, 2015

Natueco Farming - Amrut Kheti

"Mat Kar Maya ko Ahankar, Mat kar kaya ko Abhimaan, Kaaya gaar Se Kaachi,
Kaaya gaar se kachi, jaisa osra Moti,
Jhonka Pavan Ka lag jaye, kaaya dhul ho ja si"
                                                                         - Kabir

"How the Plants in Forest survive without any Fertilizers or chemicals? A fundamental question. Natueco farming science is holistic Approach Lifestyle farming. In harmony with Nature,

Deepak Suchde ji (Baba) has developed the beyond organic concept of "Amrut Kheti" after his vast experience. His contribution to save the nature is spellbound. if you are thinking on how to sustain with minimum resources in Agriculture? Amrut Kheti is the answer.



Nemavar, MP is Center point of Rewa (Narmada). Sharan is 5 kms away from Nemawar. The place has natural energy in surrounding.


Rameshbhai, The local hero. He has done farming and taken crop for one year on the banks of Narmada with single tool. And that to without any fertilizers.




Pratik and Kunal both were worth meeting. The Sharing of ideas at the end of the day was thought provoking.From herbal Tea to Shatur (Strawberry of poor), Cooking meal to Listening Kabir. Every moment was mesmerizing. Vatsal, your variety of dishes is delicious. 
                                             


From Punning to making Amrit jal, Ganga ma mandal to piping in 10 acre i learnt as per my understanding. Dipak Dada asked me to work for 2 days in farm, and in return he gave me money for fuel for next destination. First hard earned money always feels great.



When you are on right path, Destiny plans in way you to meet Good Samaritan. The experience at Sharan makes you to come back again.

Journey onward starts now!